हर बहस का अंत जीत नहीं

 अब किसी से लड़ने का मन नहीं करता…

क्योंकि समझ आ गया है—हर बहस का अंत जीत नहीं, सिर्फ थकान होती है।


पहले हर बात पर जवाब देना ज़रूरी लगता था,
अपनी बात साबित करने की एक आग थी भीतर…
लेकिन अब वो आग ठंडी हो गई है,
और उसकी जगह एक सुकून ने ले ली है।

अब चुप रह जाना आसान लगता है,
क्योंकि हर इंसान अपने ही सच में जी रहा है।

और किसी का सच बदलने की कोशिश,
दरअसल खुद को ही थकाने जैसा है।

धीरे-धीरे ये एहसास गहरा हो जाता है—
हर लड़ाई लड़ना जरूरी नहीं होता।

कुछ लोग समझने के लिए नहीं,
सिर्फ बोलने के लिए होते हैं।

हर बार समझाने की कोशिश में
हम खुद ही उलझते चले जाते हैं…
इसलिए अब न बहस करते हैं,
न सफाई देते हैं—
बस थोड़ा दूर हो जाते हैं।

क्योंकि कुछ रिश्ते जीतकर नहीं,
छोड़कर ही बचते हैं…
और कुछ सुकून ऐसे होते हैं
जो जवाब देने में नहीं,
चुप रह जाने में मिलते हैं।

अब हम साबित करने नहीं,
संभालने लगे हैं—
खुद को, अपनी शांति को।


शायद यही समझदारी है…
कि हर आवाज़ का जवाब आवाज़ नहीं होता,
और हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं होता।

कुछ बातें हवा में छोड़ देना ही बेहतर है…
ताकि हम खुद के भीतर
थोड़ा कम टूटें,
और थोड़ा ज्यादा बचें… 🖤

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